मैं एक उलझन हूं

मैं स्वयं में एक उलझन हूं,

खुद उलझता हूं और उलझन हूं।
अपने कामों को कभी नहीं सुलझाता हूं,
यूं ही फंसा रहता हूं दर-दर ठोकरें खाता हूं।

यह मैं आज तक नहीं समझ पाया,
आखिर क्यों उलझा रहता हूं।
यह उलझन आज से नहीं,
बरसों बरसों की उलझन है।

यह कुछ उलझन मेरी है,
कुछ रिश्तेदारों की है,
कुछ दोस्तों की है,
कुछ यारों की है।
यारों ने ही ऐसी उलझन डाली,
कि मैं यूं ही उलझ गया।

जैसे मकड़ी अपने ही जाल में उलझ जाती है,
वह दूसरे को तो सताती है,
पर खुद इस जाल में फंस जाती है।
न जाने ऐसा क्यों होता है।

मैं एक उलझन हूं,
मैं एक फूलचंद हूं,
मैं एक स्वयं उलझन हूं।
यह मन मेरा उलझता है,
यह बातें मेरी सुन के,
मेरी बातों को लोग भी उलझे उलझे से लगते हैं।

न जाने वह मुझे ही दुखी दुखी यूं सुनते हैं,
कि तुम एक उलझन हो,
तुम एक उलझन हो,
तुम एक उलझन हो।

लेखक: सत्य प्रकाश ढौंडियाल

इस कविता में कवि ने अपनी उलझनों को व्यक्त किया है, जो उसके जीवन का एक हिस्सा बन गई हैं। वह खुद को एक उलझन के रूप में देखता है, जो अपने ही जाल में फंसा हुआ है। कविता में कवि ने अपनी उलझनों के कारणों को ढूंढने की कोशिश की है, लेकिन वह अभी तक उन्हें समझ नहीं पाया है।

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