पेपर लीक को लेकर उत्तराखण्ड में गरमाई राजनीति, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग
देहरादून। देशभर में पेपर लीक के खिलाफ उठी युवा आवाज अब उत्तराखंड की राजनीति के केंद्र में पहुंच गई है। केंद्र में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद अब उत्तराखंड के उच्च शिक्षा एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री डा. धन सिंह रावत के इस्तीफे की मांग भी तेज हो गई है।
हाल में वीर माधो सिंह भंडारी उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय की परीक्षा के कथित पेपर लीक मामले में गिरफ्तारी और उसके बाद विपक्ष के विरोध प्रदर्शन ने राज्य की राजनीति को नया मुद्दा दे दिया है। कांग्रेस ने मंत्री को नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने की मांग की है।
यह मुद्दा केवल एक विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रह गया है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड अधीनस्थ सेवा चयन आयोग भर्ती घोटाला, विभिन्न भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं के आरोप और अब विश्वविद्यालय स्तर पर पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं के बीच यह धारणा मजबूत की है कि मेहनत के बावजूद परीक्षा प्रणाली पूरी तरह सुरक्षित नहीं है।
यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर पर उभरे परीक्षा सुधार आंदोलन की गूंज अब उत्तराखंड में भी सुनाई दे रही है।दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ छात्र असंतोष अब राज्यों की राजनीति को भी प्रभावित कर रहा है।
हाल के घटनाक्रमों में परीक्षा सुधार, जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग ने सरकारों पर दबाव बढ़ाया है। इसी व्यापक माहौल में उत्तराखंड में भी शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा सुरक्षा पर सवाल तेज हुए हैं।
देहरादून में विपक्ष ने पेपर लीक प्रकरण को लेकर मार्च निकाला और तकनीकी शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठाई। विपक्ष का तर्क है कि जब परीक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक सामने आई है, तब राजनीतिक जवाबदेही तय होनी चाहिए।
दूसरी ओर सरकार का पक्ष यह हो सकता है कि मामले में जांच चल रही है, गिरफ्तारियां हुई हैं और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, इसलिए जांच पूरी होने से पहले निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। यह विवाद केवल एक मंत्री तक सीमित नहीं है।
उत्तराखंड में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं और युवाओं से जुड़े मुद्दे चुनावी विमर्श का केंद्र बनते जा रहे हैं। बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में देरी और पेपर लीक जैसे विषय विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर दे रहे हैं।
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि आज का युवा केवल सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित नहीं है। सीधे जवाबदेही, पारदर्शिता और समयबद्ध कार्रवाई की मांग कर रही है। यही दबाव राष्ट्रीय राजनीति में दिखाई दिया और अब उसका असर राज्यों में भी महसूस किया जा रहा है। उत्तराखंड में भी छात्र संगठनों और विपक्ष ने इसी भावना को राजनीतिक मुद्दे में बदलने की कोशिश शुरू कर दी है।
इस मामले में राजनीतिक विशेषयों का मानना है कि राज्य सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। पहली, दोषियों के खिलाफ त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई कर यह संदेश देना कि परीक्षा प्रणाली से समझौता नहीं होगा। दूसरी, युवाओं का भरोसा फिर से जीतना। केवल गिरफ्तारी या जांच की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी। परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही पर ठोस सुधार दिखाई देने होंगे।
फिलहाल उत्तराखंड की राजनीति में यह बहस तेज है कि क्या नैतिक जिम्मेदारी तय होनी चाहिए या जांच पूरी होने तक इंतजार किया जाना चाहिए। इतना तय है कि पेपर लीक अब केवल कानून-व्यवस्था या शिक्षा विभाग का मुद्दा नहीं रहा।
यह युवाओं के विश्वास, रोजगार और आने वाले चुनावों का बड़ा राजनीतिक प्रश्न बन चुका है। युवाओं का असंतोष लगातार बढ़ता है और परीक्षा सुधार की मांग राज्य की सड़कों से चुनावी मंचों तक पहुंचती है, तो उत्तराखंड की 2027 की राजनीति में यह मुद्दा रोजगार के साथ सबसे प्रभावी चुनावी एजेंडा बन सकता है।