आस्था और कूडे- कचरे को अलग-अलग करना होगा: सुरेश भाई
मनुष्य अल्पकालीन सुख- सुविधाओं को हासिल करने के लिए बेहिचक अंधाधुंध प्रदूषण पैदा कर रहा है। हम जिन नदियों, पर्वतों और वहां निवास करने वाले देवी-देवताओं के दर्शन के लिए जा रहे हैं उसे कचरे के ढेर में तब्दील कर रहे हैं। पूजा सामग्री को प्लास्टिक थैलियों में भर- भरकर पुण्य कमाने के लिए हम जितने नतमस्तक हैं उससे कहीं अधिक गंगा और यमुना के उद्गम में प्लास्टिक के पहाड़ खड़े कर वापस लौट रहे हैं।
ईश्वर से क्षणिक साक्षात्कार की अनुभूति बटोरने के नाम पर पैद हो रहे प्रदूषण को नजरअंदाज करने से देवभूमि का पर्यावरण संकट में पड़ गया है। इसका ताजा उदाहरण है कि चार धाम यात्रा के डेढ़ महीने के भीतर ही 288 टन कचरा एकत्रित हो गया है।
अब तक 29 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने दर्शन किये है। अकेले केदारनाथ में 122 टन से अधिक कचरा एकत्रित हो चुका है। इसी तरह यमुनोत्री से 80 टन, गंगोत्री से 70 टन और बद्रीनाथ से 10 टन कचरा जमा हुआ है। यद्यपि यह आंकड़ा अधिक भी हो सकता।
क्योंकि यात्रा मार्ग के सभी स्थानों पर एकत्रित कचरे का पूरा आकलन करना बाकी है। क्योंकि बोतल, स्नेक्स पैकेट, चाय कॉफी के डिस्पोजल, चिप्स के पैकेट आदि प्लास्टिक युक्त कचरा रास्तों,जलस्रोतों, नदियों और उसके आसपास ढेर के रूप में दिखाई दे रहे हैं। लगभग 350 कुंतल कचरा हर रोज जमा हो रहा है,और लगभग 2100 ट्रक के बराबर प्लास्टिक समुद्र में जा रहा है।
हिमालय की तरफ बढ़ रही भीड़ के कारण ग्लेशियरों तक भारी आवाजाही के कारण प्लास्टिक कचरे का अंबार लग रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यहां के संवेदनशील इकोसिस्टम में कचरे के जमा होने से ग्लेशियर पिघलने की दर बढ़ने लगी है और भविष्य में आपदा आने के संकेत और अधिक बढ़ सकते हैं।
गंगोत्री और यमुनोत्री में आस्था के नाम पर वर्षों से से आ रहे श्रद्धालु स्नान घाटों पर अपने अंग वस्त्र के रुप में पुराने कपड़े जैसे- साड़ियां, तौलिया आदि और श्रृंगार सामग्री को यमुना और भागीरथी में फेंक रहे हैं। धार्मिक मान्यताओं के कारण तीर्थ यात्री अपने वस्त्र वहां छोड़कर वापस अपने घर चले जाते हैं। अब तक 7 कुंतल से अधिक साड़ियां पवित्र जल में लहराते हुए स्नान घाटों से बाहर निकाली गई है।
तीर्थ यात्रियों से उत्तरकाशी के जिलाधिकारी प्रशांत आर्य जी और गंगोत्री और यमुनोत्री मंदिर समिति के सदस्य अपील करते आ रहे है। जिसमें सिंगल यूज प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध है। सभी यात्रियों को अपने साथ कपड़ा या जूट का थैला रखने का सुझाव दिया गया है जिसमें वे जितना सूखा कचरा पैदा करते है, उसे निर्धारित डस्टबिन पर ही डालें।
गंगा में अपने पुराने कपड़ों को प्रवाहित करने वाले तीर्थ यात्रियों पर जुर्माना लगाने की व्यवस्था भी की गई है। एनजीटी ने नदियों में किसी भी प्रकार का कचरा या पूजा सामग्री सीधे फेंकने पर प्रतिबंध भी लगा रखा है।मुख्य स्नान घाटों पर बैरिकेटिग लगाये गये,जो विवाद का कारण भी बना। क्योंकि भारी संख्या में पहुंच रहे तीर्थ यात्री और पर्यटकों को रोकना मुश्किल हो रहा है।
पुराने कपड़े और पॉलिथीन कचरा नदियों में डालने से पानी में जहरीले तत्व माइक्रोप्लास्टिक मिल जाते हैं, जिसको जलीय जीव निगल देते हैं। और जीवों का दम घुटने लगता है, पाचन तंत्र प्रभावित होने से उनका जीवन खत्म हो जाता है।पवित्र गंगाजल की गुणवत्ता भी समाप्त होने लगती है।
वाराणसी आदि शहरों में भी धार्मिक अनुष्ठानों के बाद रंग-बिरंगे अंगवस्त्र और पूजा सामग्री को नदियों में छोड़ने की पुरानी प्रथा से प्रदूषण बढ़ रहा है। जिसके कारण स्नान और पीने योग्य गंगा जल नहीं बचा है।
केदारनाथ यात्रा मार्ग पर रुद्रप्रयाग जिला प्रशासन ने प्लास्टिक कचरे को एक ही स्थान पर एकत्रित करने के लिए “कैरी मी बैक”कार्यक्रम की शुरुआत की है। जिसमें यात्रियों से आग्रह किया जा रहा है कि वे केदारनाथ नगर पंचायत के द्वारा बैग में 400 से 500 ग्राम सूखा कचरा वापसी के समय नीचे ले जायें।जिसको गौरीकुंड में बने कलेक्शन सेंटर में निर्धारित स्थान पर जमा करने को कहा गया हैं। जहां पर कचरे का पृथक्काकरण और वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण करने की योजना है लेकिन इसका ठोस परिणाम अभी सामने आना बाकी है।
गंगोत्री में यात्रियों द्वारा स्नान घाट पर छोड़े जा रहे पुराने कपड़ों को एकत्रित करने में गंगा विचार मंच के कार्यकर्ता महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित झाला में ग्राम प्रधान अभिषेक रौतेला के नेतृत्व में यात्रियों द्वारा छोड़े गए प्लास्टिक कचरे को एकत्रित किया जा रहा है।
प्लास्टिक को जमा करने वाले लोग बाहर से आ रहे हैं। और उसको उठाने वाले लोगों की संख्या बहुत ही न्यूनतम है।जो कुछ ही स्थानों का प्लास्टिक कचरा उठाकर उनके योगदान के प्रति आभार जताया जा सकता है लेकिन प्लास्टिक संस्कृति जिस तरह से हावी है उसके मूल जड़ में जब तक नहीं पहुंचे और उसका विकल्प प्रस्तुत करने के लिए कोई मजबूत पहल नहीं हुई तो प्लास्टिक को जमा करने वाले समाज के सामने प्लास्टिक का उन्मूलन करने वाले छोटे-छोटे समूह की भागीदारी बौनी पड़ जायेगी।अतःप्लास्टिक का उन्मूलन जड़ मूल से करना होगा।
(लेखक, पर्यावरण सामाजिक कार्यकर्ता है)